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Hindi- story

मैनेजेरियल ईगो

मैनेजेरियल ईगो

 

मैनेजेरियल ईगो क्या होती है? ये तब पता चला जब एक कंपनी के बॉस ने आदत बनारखी थी की कोई भी पत्र कितना भी अच्छा औऱ सही लिखा हो ये साहब कुछ छोटी मोटी गलती निक्सल कर वापस भेजदेते।

परेशान हो कर हम एक सहलाकर क़े पास सलाह लेने पहोंचे। सलाहकार साहब न एक सरल कहानी के माध्यम सेे बड़ी आसानी से इस स्वभाव को और उसके इलाज को बताया।

गुजरात मे शादी मे जो भोजन बनता है उस मे दाल सब से महत्व् की होती है। सही दाल न बनने पर सारा भोजन ही व्यर्थ होजाता है। रसोइया दाल बनता है और घर के एक बुजुर्ग के पास जाता है और कहता है
” बाबा ये दाल चख कर बताएँगे की कैसी है?” बाबा ने दाल चखी और क्योंकि दाल एक महत्त्व का भोजन है इसलिए बाबा बोले ” बेटा दाल तो अच्छि है पर नमक थोड़ा कम है।”

रसोइया भी प्रोफेशनल था। वो झट से गया और नमक का डिब्बा ले आया और बाबा से कहा ” बाबा लीजिए जितना भी नमक कम लगा आप दाल मे डाल दे!”

बाबा को अपना ईगो संतोष ना था, इस से बाबा ने एक चुट्की नमक लिया और भरे कढ़ाव मे डाल दिया।

इस एक चुटकी नामक भरे कढ़ाव में डाल ने से क्या फर्क पड़ेगा? पर बाबा का ईगो को संतोष जरूर मिला होगा।

सलाहकार जी ने पूछा हम क्या सीखे? की हमारे साहब के पास जब पत्र लेकर जाओ तब पहली एक दो लाइन में गलती जान बुझ कर करे और दिखा दे। साहब गलती निकालेंगे और खुश….

1 Comment

  1. Very True and very often we come across with such kind of incidents, wherein we have to respect this managerial ego and get things done as a HR Mgr

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