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पंछी ऊँची उड़ानके

पंछी ऊँची उड़ानके

मैंने जेम्स कोलिन्सकी लोकप्रिय पुस्तक गुड टु ग्रेट वर्ष २०१४के मध्यमें पढ़ी थी. उस विषयने मुझ पर ना मिटने वाली छाप छोडी. उस पुस्तकसे एक वाक्य कई बार सुननेको मिलता है “Good is enemy of great”. किन्तु उस वाक्यसे अधिक मुझ पर जिसने असर की, वह विचार था “कंपनियोंको महान बनाने वाले नेता सही प्रकारके सहयात्रियोंको पहले चुनते हैं, फिर ध्येय निश्चित करते हैं कि कहाँ जाना है.”

उच्च प्रकारके ध्येय सिद्ध करने के लिये शुरू हुए दूरगामी अभियानों लिये अत्यन्त आवश्यक है कि अभियानमें जुड़ने वाले सहयात्री ‘सही’ प्रकारके हों. लेखमें उल्लेख आता है “बाहरसे तो वे समान रूपरंगवाले दीखते ही हैं, किन्तु वे ‘अन्दरसे’ ज्यादा समान होते हैं.”

निबंधात्मक शैलीमें लिखा यह लेख ओक्टोबर २०१३में मेरी फेसबुक वोलके लिये गुजरातीमें लिखा था. उस समय मैं स्कोटलेन्डवासी था. एकबार मैंने बड़ी उंचाई पर उड़ रहे देशान्तर करनेवाले ऋतुप्रवासी पंछियोंके समूहको देखा. उन्हें देखकर विचारोंकी श्रृंखला शुरू हुई. ऋतुप्रवासी पंछियोंको देखना बचपनसे ही अच्छा लगता था, किन्तु उस समय मुझे उनकी उड़ान और दूरगामी ध्येयकी प्रप्तिके लिये शुरू किये गये कठिन अभियानों और उनके नेतृत्वके बीच बड़ा साम्य दिखाई दिया, जो फिर इस लेखके स्वरूपमें लिखा.

इसलिये जब मैंने गुड टु ग्रेट पुस्तक पढ़ी, मुझे ऐसा लगा कि मेरा लेख जैसे उस सुन्दर और प्रेरणादायक पुस्तकको मैंने दिया हुआ सम्मान है.

आज तक सिर्फ शौकसे ही फेसबुक पर लिखता रहा हूँ, जो कई लोगोंको अच्छा लगा है. इस व्यावसायिक प्लेटफॉर्म पर हिन्दी और इंग्लिशमें मेरा यह पहला प्रयास है, आशा रखता हूँ कि आपको पसन्द आयेगा.

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ऊँचा उडती और दूरकी यात्रायें करती वस्तुओंके प्रति मुझे एक सहज आकर्षण है. विमानभी इसीलिये देखना अच्छा लगता है. लोकप्रिय शब्दप्रयोग ‘लम्बी रेसका घोडा’ में ‘लम्बी रेस’ उसे लोकप्रिय बनाता है. स्प्रिन्टर शब्द उतना लोकप्रिय नहीं है. मिथुन चक्रवर्तीने जिस फिल्ममें अपने जीवनका श्रेष्ठ अभिनय किया, उस फिल्म ‘स्वामी विवेकानन्द’ का नाम पहले उसके निर्माता श्री जीवी ऐयरने ‘ध मेरेथोन ऑफ़ स्वामी विवेकानन्द’ सोचा था. दूरकी यात्रायें करना मानवजातिका बहुत पुराना आकर्षण है. घोंसलेकी सुरक्षामें जीवन बिता देनेवाले और पंखोंको प्रसारकर दूर देश उड़नेवाले ऐसे प्रकार केवल पक्षीयोंमें ही नहीं मनुष्योंमें भी है. मनुष्यमें तो एक ही समय यह यह द्विधा उसको चीर रही होती है कि सुरक्षाका हाथ थामे रहना, कि दूरदेशके प्रवासी बनकर ऊँची उड़ान भरनी.

बचपनमें मेरे गाँवके खेतों पर हर वर्ष उतर आते मध्य एशियासे आये हुए कुन्ज पक्षीयोंका कलरव अभी वैसाका वैसा याद है. प्रभातसे पहले दाने और जन्तु चुननेके लिये खेतोंमें उतर आते और जब खेतका रक्षक उन्हें जोरसे आवाज़ करके उडाता तब सभी एक साथ उड़ते और कुछ ही देरमें आकाशमें इंग्लिश V आकारकी रचना बनाकर उडकर निकल पड़ते दाने ढूंढने कहीं और. उनको उस आकारमें उड़ते देखना भी एक अविस्मरणीय आनन्द था. सुश्री इला अरुणने मूलतः कच्छी ऐसा एक सुन्दर गुजराती लोकगीत गाया है जिसके शब्द है “कुन्जड ना मार वीरा कुन्जड ना मार, कुन्जड जाशे दरियापार…”. इस गीतमें नायिका कुन्जोंको उड़ाने वाले किसानको कह रही है कि “भाई, कुन्जोंको मार मत. क्योंकि वे समुद्रोंके पार जायेंगे. हम तो नहीं जा सकेंगे, किन्तु उनको तो जाने दे!”

लम्बे अंतरकी उड़ान भरनेवाले पंछी बड़ी उंचाई पर उड़ते हैं. केनेडा गीझ साढ़े आठसे नौ किलोमीटरकी उंचाई पर उड़ते हैं. साइबेरियन सारस गंगाके मैदानों तक आनेके लिये हिमालयकी गिरिमालाको लांघते हैं, और सागरमाथाको – माउन्ट एवरेस्टको लांघते हुए देखे गये हैं. वे हिमालयकी तिब्बत ओरकी ढलानों पर पड़ाव डालते हैं और अनुकूल पवनकी प्रतीक्षा करते हैं. पवन साथ देता मालूम पड़ता है कि तुरन्त अपनी पंखें प्रसारते हैं और शुरू कर देते हैं कठिन चढ़ान और ऊँची उड़ान. मार्गमें हिमालयवासी गरुड़ भी उनकी ही प्रतीक्षामें होते हैं. कई उनका भोग बन जाते हैं. बस पर्वतको कुदा दे तब तक पवन अविरत रहे वह श्रद्धा और ह्रदयमें साहस भरके उड़ान शुरू कर देते हैं. किन्तु हर बार पवन साथ नहीं देता है. कभी तो बस गिरिमाला लांघनेकी तैयारी ही होती है और पवन गिर जाता है. बड़े कदवाले पंछियोंको पतली हवामें पंखोंका फडफडाना बहुत साथ नहीं देता है. उनको वहाँसे वापस तराईयोंमें आना पड़ता है. पीछे ठण्डीकी ऋतु दबे पैर उनका पीछा कर रही होती है. उसके उन तक पहुँचनेसे पहले पवनने फिर साथ दिया तो ठीक, वरना जो भी नियतिका निर्णय.

दूर देशका प्रवास करनेवाले पंछियोंकी यात्रा पंखकी एक एक फडफडाहट पर जोखिमसे भरी होती है. घरसे जैसे जैसे दूर होते जाते हैं, वैसे वैसे सुरक्षाका आभास भी दूर होता जाता है. कबूतरोंकी तरह उनके फेरे घोंसलेसे चबूतरे तक और चबूतरेसे फिर घोंसले तक नहीं होते हैं. हमने हजारों किलोमीटरकी यात्रा करनेवाले कबूतरोंके बारेमें सुना है किन्तु उनकी वह यात्रा दूरसे वापस घर आनेकी होती है. अनजाने प्रदेशकी असुरक्षामेंसे वह घरकी सुरक्षा ढूंढता हुआ वापस घर आता है. उनका जीवन बहुत स्थानिक होता है.

यह दूरगामी पंछी एरोडायनामिक्स और ग्रुपडायनामिक्सके विज्ञान पढ़कर जन्मे होते हैं. क्या करके उनके समूह और जातिके लिये सफलता पा सकते हैं, वह वे सीख कर ही आये होते हैं.

सालोंसाल उनकी सफलताभरी लम्बी उड़ानोंका एक बड़ा कारण उनकी रिक्रूटमेन्ट पद्धति होती है. वे हरकिसीको उनके समूहका सभ्य बननेके लिये आमन्त्रण नहीं देते हैं. फॉर्म भरके और फीस चुकाकर उनके समूहका सभ्य नहीं बना जा सकता.उनके साथ वे उन्हींको उड़ने देते हैं जो उनके जैसे होते हैं. जिन्हें उनके दूर देशके गन्तव्यकी भलीभांति खबर होती है उनको ही वे अपने समूहमें जुड़ने देते हैं. हर एकको गन्तव्य तकके लम्बे अन्तरकी खबर होती है. मार्गमें जगह जगह पर आनेवाले जोखिमकी खबर होती है. वहाँ पहुँचनेके लिये कितने समय और शक्ति देने पड़ेंगे उसकी खबर होती है. कितना परिश्रम करना पड़ेगा उसकी खबर होती है. उतने परिश्रमके लिये जिनके पास उतनी उर्जा और तितिक्षा – सहनशीलता होती है. सामनेसे आनेवाले पवन और हिमालयकी गिरिमाला जैसे अवरोधोंकी खबर होती है. और कभी जब अत्यन्त आवश्यकता होगी तभी पवन साथ नहीं देगा उसकी भी खबर होती है. जिनमें इतना भोग देनेकी तैयारी हो वे ही उनके समूहमें जुड़े, वरना घोंसलेसे चबूतरे और चबूतरेसे घोंसले वाली जिंदगीमें कुछ गलत भी नहीं है. बाहरसे तो वे समान रूपरंगवाले दीखते ही हैं, किन्तु वे ‘अन्दरसे’ ज्यादा समान होते हैं.

उड़ना शुरू करनेसे पहले ही उनकी यात्राका ध्येय निश्चित होता है. उनके अभियानकी व्यूहरचना – स्ट्रेटेजी तय होती है. उनका उडनेका मार्ग तय होता है. उनके टेक्टिक्स और टेक्निक्स निश्चित होते हैं. वे अभियानके श्रेष्ठ परिणामकी आशा रखते हैं, किन्तु मार्गमें जो कनिष्ठसे कनिष्ठ परिस्थितियां आने वाली होती हैं, उनके लिये तैयार होते हैं. उनमें कोई अपनी इच्छानुसार बदलाव नहीं कर सकता. उनके टेक्टिक्स – कार्यकलायें एरोडायनामिक्स जैसे विज्ञानकी सहायतासे उनकी लम्बी उड़ानोंको सफल बनानेके लिये होती हैं. अप्रामाणिक और अनैतिक तरीकोंसे दूसरोंको और स्वयंको मूर्ख बनानेवाले नहीं होते.

वे उड़ते ही हैं ऐसा आकर बनाकर, कि सामनेसे आनेवाले पवनका अवरोध उन्हें कमसे कम लगे. उनका एक नेता भी होता है फिरभी समूहका हर एक सदस्य उड़ानके मार्गको देख सकता है. किसीभी सदस्यकी द्रष्टिको अवरोध नहीं होता है. उनकी आँखके आगे किसीकी पांख नहीं आती. समूह कहाँ जा रहा है वह सभी देख सकते हैं. वे नेताको भी देख सकते हैं.

और नेता भी समूहके सदस्योंसे तनिक भी अलग नहीं लगता है. उसने वह यात्रा सबसे ज्यादा बार की होती है और रास्ता दिखानेके लिये वह शारीरिक, और मानसिक रूपसे सक्षम होता है वही उसकी नेता बननेकी पात्रता होती है. समूहके सदस्योंको वह अपना लगता है. महात्मा गाँधी, फिडेल कास्ट्रो, ह्यूगो चावेझ, बर्नार्ड मोन्टगोमरी ऐसे नेता थे. भारतका एक भी राष्ट्रपति किसीभी सैनिकको अपना सुप्रीम कमान्डर नहीं लगता है.

इन पंछियोंके अभियानमें पारदर्शकता होती है. उड़ते समय समूहका नेता जो देख सकता है वही बिल्कुल अन्तिम सदस्य भी देख सकता है. अनुसरण करनेवाले सदस्योंको ईदी अमीनकी तरह कहीं ओर धकेलकर वह खुद कहीं ओर नहीं भागता है. उनका कोई भी हेतु समूहके सदस्योंसे छुपाया हुआ नहीं होता है. समूहके सदस्योंको नेताकी हर एक हरकतकी खबर होती है. नेता अनुगामियोंको वहीँ ले जाता है जहाँ वह स्वयम् जाना चाहता है.

दूरप्रवासी पंछियोंमें नेतृत्वकी तालीम सभीको मिलती है. सच्चा नेता अनुयायी नहीं बनाता है, वह दूसरे नेताओंका सर्जन करता है. वह स्वयंको इन ध लाइन ऑफ़ फायर रखता है. शिकारियोंका सबसे पहला निशान आगे उड़रहा अग्रणी ही बनता है. दुर्भाग्यसे अगर वह शिकारियोंकी बुलेटका निशान बन जाता है तो उसका स्थान तुरन्त भर दिया जाता है. अभियान रुकता नहीं है. गन्तव्य हरएक को ज्ञात होता है. किसीके भी अभियान छोड़ देनेसे अभियानमें विक्षेप नहीं होता है. नेता गिर जाये तो नया नेता वहींसे अभियान आगे ले जाता है. लम्बे अन्तरोंकी ट्रेनमें ड्राइवर हर कुछ घण्टोंके बाद बदलते हैं, फिर भी ट्रेन गन्तव्य पर पहुँचती ही है. नये ड्राइवर अपने स्वार्थसे या अपनी इच्छासे मार्ग नहीं बदल सकते.

बिल्कुल अन्तिम स्थान पर उड़ रहे सदस्यको भी भलीभांति ज्ञात होता है कि उन्हें कहाँ पहुंचना है, और उसकी भूमिकाका अभियानमें क्या योगदान है. दूरगामी अभियानोंमें हर एक सदस्यको मालूम होता है कि वे किस ध्येयको हांसिल करनेके लिये काम करते हैं. एपोलो अभियानसे पहले नासाकी एक ऑफिसमें किसीने एक स्वच्छता कर्मचारीको पूछा था कि वह क्या कर रहा है, तो उसका उत्तर था “मैं मनुष्यजातिको चन्द्रमा तक पहुँचानेमें सहायता कर रहा हूँ.”

अभियानके मध्य समूहमेंसे कोई हट जाये तो भी अभियान जारी ही रहता है. आरब संस्कृतिमें एक रिवाज था. दूरकी यात्राओं पर निकलने से पहले वे ऊँटोंको पेटभर खिलापिला देते. फिर ऊँटोंको खाना और पीना किसी रणद्वीप (oasis) पर ही मिलता. ऊंट बिना पानीके अठारह दिन जी सकता है. उन्नीसवे दिनसे ऊंट बैठ जाता है और आगे चलनेसे मना कर देता है. इसलिये रास्तेमें एक भी पल व्यर्थ गंवाना अर्थात् भूख और प्यासके कारण मृत्युको निमंत्रण देना था. ऊंटसवार एक भी शब्द बोले बिना कड़ी धूपमें समूहमें आगे बढ़ते ही रहते. उसमें कभी किसीको जम्हाई आ जाती, तो उसका ऊंट और ऊँटोंसे पीछे पड़ने लगता. उसमें भी अगर जम्हाईके कारण कोई अगर पीछे रह गये ऊंट परसे नीचे गिर जाता, तो कोई देखने वाला न होता. नीचे गिरा हुआ आदमी रेतमें कितना ही दौड़ कर भी चलते ऊंटको पकड़ न सकता और प्यासा मरता. आरबोंमें कहा जाता, कि “हमने जितना देखा भी नहीं है उतना खून रेगिस्तानमें सूख चुका है.” उसके खाली ऊंट पर किसीकी नजर पड़ती तो वे दूसरेको कह देता “उसके दिन आज तक ही लिखे गये थे.” कोई उनको ढूंढने पीछे न मुड़ता. इस तरह अभियानको धीमा न पड़ने देनेकी कठोरताने ही आरबोंको मोरक्कोसे मध्य एशिया तक अपना राजकीय और सांस्कृतिक प्रभाव फ़ैलानेमें सहायता की थी.

इन पंछियोंमें जो धीमा पड़ने लगते हैं वे स्वयम् ही पीछे हट जाते हैं और अन्योंको आगे आने देते हैं. बड़ी तोंदके भारके कारण ठीकसे चल भी न सकने वाले, जिनका एक पैर कब्रमें लटका हुआ होता है फिरभी नेतृत्व नहीं छोड़ने वाले राजनैतिक वहाँ नहीं होते हैं. अन्य सदस्य ही उतने स्फूर्तिमान् होते हैं कि धीमा उड़ने वालेको स्वेच्छासे ही उनको आगे आने देना पड़ता है. यात्राके दौरान नेतृत्वका अभ्यास भी सबको बारी बारी मिलता है. नेता ही बार बार दूसरे स्थान पर आकर अन्योंको आगे आने देता है.

दूरगामी अभियानोंमें सदस्योंके बीच प्रत्यायन (communication) अविरत और पारदर्शक होता है. हर एक सभ्य एकदूसरोंके इशारे समझते हैं. लगता है कि उड़ना शुरू करनेके बाद उनका कलरव जारी ही रहता है किन्तु वे निरन्तर बोलते रहकर शक्ति नहीं गंवाते हैं. सबसे पहले नेता आवाज़ देता है, फिर उसके बादवाले क्रम पर उड़ रहे दो पंछी आवाज़ देते हैं, उनके बाद उसके बादवाले क्रमपर उड़ रहे दो. इस तरह बिल्कुल अन्तिम क्रम पर उड़ रहे सदस्य अपनी उपस्थितिका संकेत देते हैं. फिर नेता आवाज देता है. इस तरह उनका कलरव इस कारणसे जारी ही रहता है.

यात्रा शुरू होनेके बाद वे मार्गच्युत नहीं होते हैं. उनकी उड़ानका मार्ग ऋतुप्रवाही पवनों और जेटस्ट्रीम जैसे प्राकृतिक परिबलोंका आधार और लाभ लेकर निश्चित किया गाया होता है. नये सदस्यको ऐसा भी लग सकता है कि मार्ग लम्बा है और गन्तव्यकी ही दिशामें सीधा उड़नेसे अन्तर काफ़ी कट सकता है फिर भी वे कभी शोर्टकट नहीं लेते. क्योंकि उन्हें अपनी वर्षोंवर्ष सफल हुयी व्यूहरचना पर विश्वास होता है. रास्ता बदलनेका अनावश्यक सयानापन वे नहीं दिखाते. आर्कटिक टर्न जैसे पंछियोंको तो अभियान शुरू होनेके बाद विराम भी नहीं मिलता है. आर्कटिक प्रदेशोंसे शुरू हुयी उनकी यात्रा एन्टार्कटिका पर समाप्त होती है.

और अगर विश्राम करना भी पड़े तो किसीने थोडेसे दाने बिखरा दिये हों वहाँ उतर कर वे अपनी यात्रामें विक्षेप नहीं होने देते. उनको उतरनेके लिये तो खेत ही चाहियेम जहाँ सभी उतर सके और पेट भर सके. दूरप्रवासी यात्रियोंको प्रलोभनरूपी दाने नहीं ललचा सकते. उनको तो समशीतोष्ण देशोंकी हरीभरी भूमि पर ही पोषण पाना होता है, उनकी संततिको जन्म देना होता है. हनुमानजी जब संजीवनी लेकर अ रहे थे तब रावणने कई प्रलोभन भेजे थे किन्तु उनका सूत्र था “रामकाज किये बिना मोहे कहाँ विश्राम…” सत्ता जैसे सस्ते दानोंसे प्रलोभन देखकर अपने महान अभियानको छोड़ कर नीचे नहीं उतरते यह पंछी.

गन्तव्य पहुंचकर भी वे विश्राम नहीं करते हैं. पुनरागमनकी यात्राके लिये शक्तिका संचय करनेमें लग जाते हैं. उन्हें नयी संततिका स्वागत भी करना होता है. उनके लिये घोंसले भी बनाने होते हैं. शिकारी वहीँ भी होते हैं. निश्चिन्त उन्हें वहाँ भी कोई नहीं खाने देता. सावधानी उन्हें वहाँ भी रखनी होती है. वहाँ पहुँचकर एक भी सदस्य आराम नहीं करता है. सभीको काम पर लग जाना होता है. हरएकको भलीभांति ज्ञात होता है कि गन्तव्य पर पहुँचकर उन्हें क्या करना है. नेता भी उतना ही काम करता है जितना सबसे प्राथमिक सदस्य करता है. सफल कंपनियोंके कार्यालयोंमें सर्वोच्च अधिकारी रोज सबसे पहले आते हैं, और सबके बाद जाते हैं.

झगडे तो वहाँ भी होते हैं. मादाओंके लिये नर लहूलुहान होने तक लड़ते हैं. बनेबनाये घोंसलोंके लिये मादायें भी झगडती हैं. जिनके बच्चे जी न सके वैसी मादायें बिना माँके बच्चोंकी माँ बननेके लिये झगड़ती हैं. किन्तू यह सब झगडे स्थानिक और व्यक्तिगत होते हैं. उनके अभियानको असर नहीं करते. व्यक्तिगत शत्रुताका वैर इस तरहसे नहीं लिया जाता कि अभियानको हानि पहुंचे.

और जब वतनकी भूमि पुकारती है तब वे नयी पीढ़ीको साथ ले कर पुनरागमनकी यात्रा – ऊँची और लम्बी उड़ान शुरू कर देते हैं. कुछ होते हैं जो गन्तव्य पर आकर ही थक गये होते हैं. कईयोंको वहाँ रहना पसन्द आ जाता है तो वे वहीँ रह जाते हैं और स्थायी घर बना लेते हैं. किन्तु कुन्ज जैसे पंछियोंका काम तो है उड़ना, उड़ते रहना. जो वहाँ रुक जाते हैं उनके भीतरकी कुन्ज वहीँ मर जाती है. जैसे साधु चलता भला, कुन्ज उडती भली.

क्या हमें पता है, हमें कहाँ जाना है? गन्तव्य कितना दूर है उसका पता है? किस तरहसे जा सकेंगे यह पता है? मार्गमें क्या क्या अवरोध आयेंगे यह पता है? हमने प्राकृतिक सामाजिक परिबलोंका अनुमान करके ध्येय तकका श्रेष्ठ मार्ग निश्चित किया है? इस लम्बी और कठिन यात्रा पर हमारे साथ कौन कौन आयेंगे यह पता है? ईर्षा, स्पर्धा, मतभेद, मनभेद, सभी अवरोध करेंगे ही. किन्तु अभियानको हानि न करे उसके लिये हमने कोई आयोजन किया है? हमारी शक्तियोंका और निर्बलताओंका हिसाब किया है?

दोस्तों, हम किस तरहके पंछी हैं? घोंसलेकी सुरक्षासे चबूतरे तक और चबूतरेसे फिर घोंसले तक आनेजानेमें जीवन बिताने वाले, कि ऊँचे और श्रेष्ठ ध्येय निर्धार करके उसकी साधनामें ऊँचा उड़ने वाले? सस्ते दानोंके जैसे प्रलोभन देखकर अभियान छोड़कर नीचे उतर जानेवाले, कि ध्येयसिद्धि तक विश्रामका त्याग करने वाले? अभियानको समर्पित, कि भ्रामक आत्मसंतोषकी खातिर अभियानकी हानि करने वाले निर्लज्ज राजनीतिकार?

जिसको ध्येयका ज्ञान नहीं वह कुन्ज नहीं. ध्येय तकके मार्गकी खबर न हो वह कुन्ज नहीं. घोंसलेकी सुरक्षामें आराम करना अच्छा लगे वह कुन्ज नहीं. ध्येयसिद्धिके लिये आवश्यक शक्ति और सामर्थ्यका संचय ना करे वह कुन्ज नहीं. सभी सहयात्री पेटभर खा सके उतने दाने न हों तो जिसे अभियान छोड़कर उतर जानेका मन हो वह कुन्ज नहीं. अभियानके मध्य जो धैर्य खोने लगे वह कुन्ज नहीं. फायरिंगकी लाइनमें स्वयंको रखनेकी तैयारी न हो वह कुन्ज नहीं. नेतृत्वको चिपककर रहे वह भी कुन्ज नहीं. अन्योंको आगे बढ़ने न दे वह भी कुन्ज नहीं.

इनमेंसे कुछ भी अगर हमारे चारित्र्यमें देखनेको मिले तो ध्यान हमें रखना है मित्रों, कि हमारी महत्वाकांक्षारूपी कुन्ज ध्येयसिद्धिके लिये जीवित रहे. उस कुन्जको मारना नहीं, मरने देना नहीं. जरा भी सुरक्षा अथवा विश्राम ढूंढनेका मन हो, तो बिसरा गया कच्छी/गुजराती लोकगीत याद करना…

“कुन्जड ना मार वीरा कुन्जड ना मार, कुन्जड जाशे दरियापार…”.

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत

(उठो, जागो, सीखो, और महान सिद्ध करो)

–   कठोपनिषद्

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